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" जीवन पुष्प में आप सभी का हार्दिक स्वागत है "

" प्रकृति की गोद में खिला एक सुंदर कोमल पुष्प कली से फूल बनकर अपने सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धित करने का ध्येय रखते हुये कभी गर्मियों की तपिश, तो कभी बरसातों की बौछार, तो कभी शर्दियों की ठिठुरन और ना जाने क्या क्या सहकर ये अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ये आने वाली पीढ़ी का सृजन कर मुरझाकर सूख जाता है और धरती पे गिरकर मिट्टी में विलीन हो जाता है। हमारा संपूर्ण मानव जीवन भी एक पुष्प के समान है...। "

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08 June, 2016

जज्बा-ए -मोहब्बत

है जिन्दा आज भी जज्बा    
अभी मैं झुक नहीं सकता !   
आरजू मुकम्मल हो या न हो
सफ़र ये रुक नहीं सकता !!
जब तुम याद आती हो 
एक कसक सी जगती है...
निगाहें फलक पे टिकती है
नजरे नम हो उठती है...
वही तराना गाता हूँ...
शबनम फिर से टपकती है ...!!

प्रेम का दीप



ए काश कि तुम्हे भी पता होता
अपना मिलन है चंद घड़ियों का
मुद्दत से जुड़े थे जिस बंधन में
टूटेगा मोती अब उन लड़ियों का !

ए काश कि तुम्हे भी पता होता

हम गले कभी अब, मिल न सकेंगे
रख के सर, तेरे कंधों पे सनम
कभी सिसक कर रो न सकेंगे !

ए काश कि तुम्हे भी पता होता

जुदा होकर  गम नहीं  करना
अपनी आँखें  नम नहीं करना  
मिलकर भी राधा –कृष्णा को देखो
कभी एक ना हो पाए थे  !
फिर भी दुनिया में वो अपना
एक  प्रेम का दीप जलाये थे ...!!!

11 July, 2015

प्रेम पथ

सहर्ष प्रेम पथ पर
हम दीपक जलाये
थी चाहत उड़ने की
दूर पंख फैलाये
था तकदीर का दोष
या तदबीर का रोष
जो मुन्तजिर हुए हम
और छुट गया संग
गूंजती है आज भी
आवाज रूहानी सी
उठती है सीने में
एक कसक पुरानी सी
अब नीर नैनों के   
स्वछन्द बह जाये
एक संदेसा है उनको  
वो भी दिल से भुलाये     
ताकि बिसरी हुई यादें
अब, और न रुलाये...!

10 July, 2015

रंग-बेरंग

कब सुन पाउँगा फिर 
अम्मा की वो लोरी,
खाली हो चूका है   
किस्से की तिजोरी !
सुनते थे दास्ताँ कभी
चुप-चाप परियों की,
अब सुनते है सिर्फ
टिक–टिक घड़ियों की !
आधी रातों में उठकर
बैठ जाते है अक्सर,
कब मुमकिन होगा फिर 
आँचल का मयस्सर...!


आ गये कितने दूर
छोड़ कर वो बचपन
अब छुट चुका पीछे   
सच्चाई, कोमलपन
हूँ यहाँ शहर में
लोंगों की शोर में
सच्ची मुहब्बत नहीं
सच्ची ईबादत नहीं
बस स्पर्धाओं का
हर तरफ जंग है
ज़िन्दगी रंग कभी,
जिंदगी बेरंग है ...!

03 March, 2013

अश्रु और आँचल

पुष्पित थी अभिलाषा मेरी
पर, हिस्से में तो काँटे थे
 भेद गये वो तन–मन को
जिसे हम प्रेम से बाँटे थे 
बुत बने यूँ खड़े रहे हम
वर्षों से बिन प्रतिफल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का  
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |


ह्रदय धक् से धड़क रहे थे
हम जीवन में सरक रहे थे
खुलती और बंद होती पलकें
जब गिरे तो थी मुट्ठी में रेत
रह गई वो भी वहीँ फिसल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का  
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

दन्त कृदंत आह उठी थी  
तन में लगी थी एक ठिठुरन
  गम लहराया हिम् सा छाया  
पर, अस्थि बच गई गल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का 
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

सन्नाटा था घना घना सा
भयभीत नैन, चौकस कर्ण
फैली थी बस तम की चादर
नभ धरा सब एक ही वर्ण
कहीं नहीं था जन की रौनक
आहट न कोई हलचल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का 
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

एक सुनहला पुनर्जागरण
खिली तिमिर में नई किरण
अपना स्वप्न प्राणों से सिंचित
सुन्दर हो गया पुलकित मन
  जगमग-जगमग दीप जले है  
मेरे नवजीवन राजमहल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का  
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

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