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" जीवन पुष्प में आप सभी का हार्दिक स्वागत है "

" प्रकृति की गोद में खिला एक सुंदर कोमल पुष्प कली से फूल बनकर अपने सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धित करने का ध्येय रखते हुये कभी गर्मियों की तपिश, तो कभी बरसातों की बौछार, तो कभी शर्दियों की ठिठुरन और ना जाने क्या क्या सहकर ये अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ये आने वाली पीढ़ी का सृजन कर मुरझाकर सूख जाता है और धरती पे गिरकर मिट्टी में विलीन हो जाता है। हमारा संपूर्ण मानव जीवन भी एक पुष्प के समान है...। "

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12 October, 2011

दर्द का मारा


          मेरी ख्वाहिश तुम मत करना
          मेरे लिये आहें मत भरना
          मैं अगले जनम में तुम्हारा हूं
          अभी मैं कई दर्दों का मारा हूं।


बन गया जीवन खानाबदोश
होश में भी, दीखता हूं बेहोश
मैं आसमां का टूटा तारा हूं
अभी मैं कई दर्दो का मारा हूं।

           मिलकर भी हम मिल नही पाये
           खिल कर भी हम खिल नही पाये
           जब मुरझाया तो, तूम्हें पुकारा हूं
           अभी मैं कई दर्दों का मारा हूं।

जिस जल से बुझती प्यास तेरी
जिसे देख के जगती आस तेरी,
आज वही दिशाहीन, जलधारा हूं
अभी मैं कई दर्दों का मारा हूं।

2 comments:

संजय भास्कर said...

सुंदर रचना के लिए आपको बधाई

संजय कुमार
आदत….मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अभिव्यंजना said...

बहुत सुंदर रचना !

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