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04 February, 2013

काव्य सृजन

रूह की धरा से
मन के फलक तक  
जब उठती है अदृश्य 
मदमस्त दिशाहीन 
एक भावनाओं का सैलाब !


तब घटा बन, धीमें-धीमें  
कलम की रगों से 
बरसती है बूंद - बूंद  
फिर खिलता है पन्नों पे
शब्दों का सुन्दर गुलाब !

मैं देखा हूँ शिद्दतों से
 मुहब्बत में जब कलम 
चूमती है पन्नों को
तभी दुनिया कहती है
बहुत सुन्दर...लाजबाब !!!

12 comments:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

मैं देखा हूँ शिद्दतों से
मुहब्बत में जब कलम
चूमती है पन्नों को
तभी दुनिया कहती है

बहुत सुन्दर...लाजबाब ,,,,,

RECENT POST बदनसीबी,

रविकर said...

बढ़िया प्रस्तुति |
बधाई स्वीकारें ||

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर प्रस्तुति

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 5/2/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है

Ankur Jain said...

सुंदर रचना....

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सच है.....

रश्मि शर्मा said...

फि‍र खि‍लता है पन्‍नों पे सुंदर गुलाब....बहुत सुंदर

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत खूब

सदा said...

मैं देखा हूँ शिद्दतों से
मुहब्बत में जब कलम
चूमती है पन्नों को
तभी दुनिया कहती है
बहुत सुन्दर...लाजबाब !!!
उत्‍कृष्‍ट पंक्तियां ...

दिगम्बर नासवा said...

ये असर मुहब्बत का है या कलम का या मौसम का ...
सिद्दत रहनी चाहिए बस ...

Dinesh pareek said...

क्या खूब कहा आपने वहा वहा क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
मेरी नई रचना
प्रेमविरह
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

mohansingh said...

पहली बार पड़ा बहुत सुन्दर लगा.......

लिखिए अपनी भाषा में...

जीवन पुष्प

हमारे नये अतिथि !

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