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" जीवन पुष्प में आप सभी का हार्दिक स्वागत है "

" प्रकृति की गोद में खिला एक सुंदर कोमल पुष्प कली से फूल बनकर अपने सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धित करने का ध्येय रखते हुये कभी गर्मियों की तपिश, तो कभी बरसातों की बौछार, तो कभी शर्दियों की ठिठुरन और ना जाने क्या क्या सहकर ये अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ये आने वाली पीढ़ी का सृजन कर मुरझाकर सूख जाता है और धरती पे गिरकर मिट्टी में विलीन हो जाता है। हमारा संपूर्ण मानव जीवन भी एक पुष्प के समान है...। "

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11 October, 2011

अपना गॉंव



जन्मभूमि की सौंधी मिट्टी मे
हम प्रेमजल बरसायेंगे,
पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।



अकेले खेतों के पगडंडी से
हम लकड़ी नही लायेंगे,
गॉंव के लोग घूरते हैं मुझको
हम पनघट पे कैसे जायेंगे।

पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।

मर गई बकरी, दुबली है गैया
चारा क्या इसे खिलायेंगे?
बीमार पड़ी है खाट पे मैया,
दवा क्या इन्हें पिलायेंगे।

पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।

हमें नही महलों का सपना
टूटी मड़ैया सा घर अपना,
इसी में खूशी के दो पल
हम सब साथ बितायेंगे

पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।

2 comments:

sushma 'आहुति' said...

भावपूर्ण रचना....

Reena Maurya said...

waw ....
very beautiful poem

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