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" जीवन पुष्प में आप सभी का हार्दिक स्वागत है "

" प्रकृति की गोद में खिला एक सुंदर कोमल पुष्प कली से फूल बनकर अपने सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धित करने का ध्येय रखते हुये कभी गर्मियों की तपिश, तो कभी बरसातों की बौछार, तो कभी शर्दियों की ठिठुरन और ना जाने क्या क्या सहकर ये अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ये आने वाली पीढ़ी का सृजन कर मुरझाकर सूख जाता है और धरती पे गिरकर मिट्टी में विलीन हो जाता है। हमारा संपूर्ण मानव जीवन भी एक पुष्प के समान है...। "

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03 March, 2013

अश्रु और आँचल

पुष्पित थी अभिलाषा मेरी
पर, हिस्से में तो काँटे थे
 भेद गये वो तन–मन को
जिसे हम प्रेम से बाँटे थे 
बुत बने यूँ खड़े रहे हम
वर्षों से बिन प्रतिफल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का  
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |


ह्रदय धक् से धड़क रहे थे
हम जीवन में सरक रहे थे
खुलती और बंद होती पलकें
जब गिरे तो थी मुट्ठी में रेत
रह गई वो भी वहीँ फिसल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का  
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

दन्त कृदंत आह उठी थी  
तन में लगी थी एक ठिठुरन
  गम लहराया हिम् सा छाया  
पर, अस्थि बच गई गल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का 
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

सन्नाटा था घना घना सा
भयभीत नैन, चौकस कर्ण
फैली थी बस तम की चादर
नभ धरा सब एक ही वर्ण
कहीं नहीं था जन की रौनक
आहट न कोई हलचल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का 
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

एक सुनहला पुनर्जागरण
खिली तिमिर में नई किरण
अपना स्वप्न प्राणों से सिंचित
सुन्दर हो गया पुलकित मन
  जगमग-जगमग दीप जले है  
मेरे नवजीवन राजमहल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का  
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

16 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 04-03-2013 को सोमवारीय चर्चा : चर्चामंच-1173 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

रविकर said...

बहुत बढ़िया है आदरणीय-
शुभकामनायें-

दिनेश पारीक said...

बहुत खूब

मेरी नई रचना
आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

ये कैसी मोहब्बत है

कविता रावत said...

एक सुनहला पुनर्जागरण
खिली तिमिर में नई किरण
अपना स्वप्न प्राणों से सिंचित
सुन्दर हो गया पुलकित मन
जगमग-जगमग दीप जले है
मेरे नवजीवन राजमहल के
प्रतीक्षा है उस आँचल का
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के |

....................
आस का दीया हर हाल एमिन मन में जगमगाता रहे तो कभी न कभी उसका कद्रदान मिल ही जाता है ,,
बहुत बढ़िया गीत

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत ही उम्दा अभिव्यक्ति,,,,,बधाई,,

Recent post: रंग,

दिगम्बर नासवा said...

सन्नाटा था घना घना सा
भयभीत नैन, चौकस कर्ण
फैली थी बस तम की चादर
नभ धरा सब एक ही वर्ण
कहीं नहीं था जन की रौनक
आहट न कोई हलचल के

प्रतीक्षा है उस आँचल का
जिसे क़द्र हो अश्रुजल के ...

मन में आशा हो तो प्रतीक्षा जरूर पूरी होती है ...
प्रवाहमय ... सुन्दर भावनाओं से लिप्त ... अच्छी रचना है मनीष जी ...

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत खूब

neeraj 'neer' said...

bahut khoobsoorat rachna..
neeraj 'neer'

दिनेश पारीक said...

बहुत खूब सार्धक लाजबाब अभिव्यक्ति।
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ ! सादर
आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
अर्ज सुनिये
कृपया मेरे ब्लॉग का भी अनुसरण करे

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत खूबसूरत और भावप्रवण, बधाई.

सतीश सक्सेना said...

अच्छा लगा आपको पढ़कर !!
मंगलकामनाएं !

अभिव्यंजना said...

बहुत सुंदर रचना ! होली की हार्दिक शुभकामनाएँ .......

Anju Mishra said...

मनीष जी अपने ब्लॉग पर शामिल करने के लिए आभार .....

harekrishna ji said...

मुझे आपका blog बहुत अच्छा लगा। मैं एक Social Worker हूं और Jkhealthworld.com के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य के बारे में जानकारियां देता हूं। मुझे लगता है कि आपको इस website को देखना चाहिए। यदि आपको यह website पसंद आये तो अपने blog पर इसे Link करें। क्योंकि यह जनकल्याण के लिए हैं।
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