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" प्रकृति की गोद में खिला एक सुंदर कोमल पुष्प कली से फूल बनकर अपने सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धित करने का ध्येय रखते हुये कभी गर्मियों की तपिश, तो कभी बरसातों की बौछार, तो कभी शर्दियों की ठिठुरन और ना जाने क्या क्या सहकर ये अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ये आने वाली पीढ़ी का सृजन कर मुरझाकर सूख जाता है और धरती पे गिरकर मिट्टी में विलीन हो जाता है। हमारा संपूर्ण मानव जीवन भी एक पुष्प के समान है...। "

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08 June, 2016

प्रेम का दीप



अब अपना मिलन है चंद घड़ियों का
मुद्दत से जुड़े थे जिस बंधन में,
टूटेगा मोती अब उन लड़ियों का !

गले कभी अब हम मिल न सकेंगे
रख के सर तेरे कंधों पर,
कभी सिसक कर रो न सकेंगे !

 
जुदा होकर  भी गम नहीं  करना
अपनी आँखें  नम नहीं करना  

मिलकर राधा –कृष्णा को देखो
कभी एक नहीं हो पाए थे  !
फिर भी दुनिया में अपना वो
प्रेम का दीप जलाये थे ...!

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