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" जीवन पुष्प में आप सभी का हार्दिक स्वागत है "

" प्रकृति की गोद में खिला एक सुंदर कोमल पुष्प कली से फूल बनकर अपने सम्पूर्ण वातावरण को सुगन्धित करने का ध्येय रखते हुये कभी गर्मियों की तपिश, तो कभी बरसातों की बौछार, तो कभी शर्दियों की ठिठुरन और ना जाने क्या क्या सहकर ये अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। ये आने वाली पीढ़ी का सृजन कर मुरझाकर सूख जाता है और धरती पे गिरकर मिट्टी में विलीन हो जाता है। हमारा संपूर्ण मानव जीवन भी एक पुष्प के समान है...। "

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11 July, 2015

प्रेम पथ

सहर्ष प्रेम पथ पर
हम दीपक जलाये
थी चाहत उड़ने की
दूर पंख फैलाये
था तकदीर का दोष
या तदबीर का रोष
जो मुन्तजिर हुए हम
और छुट गया संग
गूंजती है आज भी
आवाज रूहानी सी
उठती है सीने में
एक कसक पुरानी सी
अब नीर नैनों के   
स्वछन्द बह जाये
एक संदेसा है उनको  
वो भी दिल से भुलाये     
ताकि बिसरी हुई यादें
अब, और न रुलाये...!

2 comments:

Vijay Gupta said...

AAPKI KAVITA PADH KE HAME APNI KAHANI YAAD AA GAYI..
SUPERB KAVITA, SHABDO KA TAALMEL BAHUT ACHCHA HAI...

मनीष कुमार said...

बहुत - बहुत धन्यवाद जी !!!

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